मुम्बई/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। सिनेमा के पर्दे पर जब कोई ऐतिहासिक कहानी उतरती है, तो वह अपने साथ उम्मीदों और जिम्मेदारियों का एक भारी बोझ लेकर आती है। निर्देशक रजनीश घई की फिल्म ‘120 बहादुर’ इसी की एक मिसाल है। यह फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध की उस यादगार घटना को दिखाती है, जहाँ 13 कुमाऊँ की ‘चार्ली कंपनी’ के 120 जवानों ने रेजांग ला की बर्फीली चोटी पर हज़ारों चीनी सैनिकों को अपनी आखिरी साँस तक रोके रखा। लेकिन क्या यह फिल्म उस ऐतिहासिक सच और भावना को पूरी तरह से पकड़ पाई है, जिसकी उम्मीद ‘अहीर समाज’ दशकों से कर रहा है? यह सवाल एक दो-धारी तलवार की तरह है।
फिल्म का नज़रिया: एक मेजर और उसके बहादुरों की गाथा
फिल्म की शुरुआत महानायक अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ से होती है, जो कहते हैं, “यह कहानी है मेजर शैतान सिंह भाटी और उनके 120 बहादुरों की।” यह पहली पंक्ति ही फिल्म का दृष्टिकोण तय कर देती है—यह कहानी एक अफसर और उसकी यूनिट की है। बेशक, फिल्म की शुरुआत में अहीर समुदाय के शौर्य की प्रशंसा में कुछ पंक्तियाँ हैं, जैसे “अहीरों की रगों में जो खून दौड़ता है, वो किसी और की रगों में नहीं है,” लेकिन कहानी का केंद्र मेजर शैतान सिंह भाटी का नेतृत्व ही रहता है।
एक फिल्म के तौर पर देखें, तो ‘120 बहादुर’ एक शानदार वॉर फिल्म है। इसके एक्शन सीक्वेंस दमदार हैं, सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है और यह युद्ध की भयावहता को पर्दे पर उतारने में सफल होती है। जब अंत में नैरेटर कहता है कि “चीनी सेना मेजर साहब के कारनामों से दंग रह गई, उन्हें समझ आया कि उनका पाला किस तरह के अफ़सर से पड़ा है,” तो यह फिल्म के नज़रिए को और पुख्ता कर देता है। फिल्म निर्माताओं ने कभी यह दावा नहीं किया कि वे ‘अहीर गाथा’ बना रहे हैं; उन्होंने एक युद्ध की कहानी बनाने का वादा किया था, और उन्होंने वह काम बखूबी किया है।
चित्रण पर सवाल: अनुशासनहीनता और चॉकलेट की लड़ाई
फिल्म की कहानी जहाँ एक ओर अहीर सैनिकों के शौर्य को सलाम करती है, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे दृश्य भी दिखाती हैं जो समाज के लोगों को असहज कर सकते हैं। जब एक कमांडर सवाल करता है, “ये अहीर लड़के हैं, खेतों से आए हैं, क्या ये यह काम कर पाएँगे?” या जब स्वयं मेजर भाटी कहते हैं कि “अंग्रेजों के ज़माने में पूरी अहीर रेजिमेंट होती थी, पर अहीरों में अनुशासन नहीं है, इसीलिए एक बटालियन में सिमट कर रह गए हो,” तो यह एक विरोधाभास पैदा करता है।
फिल्म में एक दृश्य, जहाँ सैनिक चॉकलेट के एक टुकड़े के लिए एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं, इसी अनुशासनहीनता की धारणा को मज़बूत करने के लिए रखा गया प्रतीत होता है। शायद यह किरदारों के भोलेपन और उनके वीर बनने तक के सफ़र को दिखाने की एक सिनेमाई कोशिश हो, लेकिन यह उन वीर शहीदों की छवि के साथ मेल नहीं खाता, जिन्होंने दुनिया की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक लड़ी थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नामांकन
फ़िल्म ‘120 बहादुर’ के रिलीज से पहले अहीर समाज ने कई बार इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अहीर जवानों का पर्याप्त सम्मान एवं उनका नाम फिल्म के क्रेडिट्स में शामिल नहीं था। इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया और कोर्ट ने आदेश दिया कि फिल्म के अंत में 120 शहीद अहीर जवानों के नाम दिखाए जाएँ। इस आदेश के बाद, अंतिम क्रेडिट्स में सभी 120 अहीरों के नाम शामिल किए गए, जो सही मायनों में उनकी बहादुरी का सम्मान था।
मांग, सिनेमा और सियासत
यहीं पर सबसे बड़ा सवाल उठता है। अहीर समुदाय को यह समझना होगा कि उनकी रेजिमेंट की जायज़ माँग का बोझ किसी फिल्म निर्माता या अभिनेता के कंधे पर नहीं डाला जा सकता। ‘120 बहादुर’ एक कमर्शियल फिल्म है, इतिहास का दस्तावेज़ नहीं। समुदाय की दशकों पुरानी माँग, जो सम्मान और पहचान से जुड़ी है, उसे सिनेमा के चश्मे से देखना या उस पर निर्भर रहना सही नहीं है।
यह माँग किसी एक जाति के वित्तीय हित के लिए नहीं है, बल्कि देश के लिए दिए गए बलिदानों और भविष्य में दी जाने वाली आहूतियों के लिए एक नाम, एक पहचान पाने की है—जिसे ‘अहीर रेजिमेंट’ कहा जाए। इस लड़ाई को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लड़ना होगा, न कि किसी फिल्म के रिव्यू या बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के आधार पर।
निष्कर्ष
‘120 बहादुर’ एक अच्छी फिल्म है जो रेजांग ला के शहीदों को श्रद्धांजलि देती है, लेकिन अपने सिनेमाई नज़रिए से। इसे इतिहास की किताब मानना एक भूल होगी। अहीर समुदाय को इस फिल्म को एक आर्ट के रूप में देखकर अपनी रेजिमेंट की माँग को इससे अलग रखना चाहिए। सरकार को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि एक समाज अपने सम्मान के लिए आवाज़ उठा रहा है। अहीर धाम न केवल सामाजिक एकता का केंद्र है, बल्कि यह उनके बहादुरी और बलिदान के सम्मान को जीवित रखने का माध्यम भी है। फिल्में आती-जाती रहेंगी, लेकिन रेजांग ला के 120 बहादुरों का बलिदान और उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी, चाहे उसे पर्दे पर कैसे भी दिखाया जाए।


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