हिंद दी चादर: 24 नवम्बर; गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस

धर्म/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। 24 नवम्बर का दिन भारतीय इतिहास में केवल एक तिथि भर नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस और त्याग का प्रतीक है, जिसने धार्मिक स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया। यह दिवस गुरु तेग बहादुर की शहादत को समर्पित है, जिन्हें दुनिया ‘हिंद दी चादर’ के नाम से जानती है। उनका बलिदान भारतीय सभ्यता की उस आत्मा का घोष है, जो आस्था और मानवीय गरिमा के लिए किसी भी अत्याचार के सामने झुकने से इंकार करती है।

गुरु तेग बहादुर सिख पंथ के नवें गुरु थे। 1621 में जन्मे गुरु ने 1665 से 1675 तक गुरु पद संभाला। उनका जीवन तप, वीरता, सादगी और आध्यात्मिकता का मिश्रण था। उन्होंने व्यापक यात्राएँ कीं और गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज उनकी बाणी आज भी प्रेरणा का स्रोत मानी जाती है। धार्मिक असहिष्णुता के दौर में उन्होंने न केवल सिख समुदाय, बल्कि पूरे समाज के लिए न्याय और करुणा का संदेश दिया।

इतिहास बताता है कि औरंगज़ेब के शासनकाल में जबरन धर्मांतरण और धार्मिक उत्पीड़न बढ़ गया था। कश्मीरी पंडितों और अन्य पीड़ित समुदायों ने अपनी आस्था बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर से सहायता की गुहार लगाई। गुरु ने यह संघर्ष किसी एक धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के अधिकारों के लिए लड़ा, जिसे अपनी उपासना और विश्वास को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार होना चाहिए।

1675 में मुगल सत्ता ने गुरु तेग बहादुर को गिरफ़्तार कर महीनों तक कैद में रखा और कठोर यातनाएँ दीं। उन्हें इस्लाम स्वीकार करने, चमत्कार दिखाने या मृत्यु – इन तीन विकल्पों में से एक चुनने को कहा गया। इतिहास गवाह है कि गुरु ने दबाव और क्रूरता के आगे झुकने से इंकार कर दिया। उन्होंने न धर्म बदला, न अपनी आध्यात्मिकता को तमाशा बनने दिया, और अंततः 24 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में उनका सिर कलम कर दिया गया।

शहादत के इस दौर में गुरु के तीन निकट साथियों – भाई मती दास, भाई दयाला और भाई सती दास – को भी अत्यंत अमानवीय तरीके से शहीद किया गया। इसके बावजूद गुरु की धैर्य, स्थिरता और शांति डगमगाई नहीं। यह घटना धार्मिक स्वतंत्रता के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हुई।

हर वर्ष 24 नवम्बर को देश भर में गुरुद्वारों, नगर कीर्तन, कीर्तन-दीवान, कथा और सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस मनाया जाता है। कई संस्थाएँ इस दिन को धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक दिवस के रूप में भी रेखांकित करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहां धार्मिक पहचान और स्वतंत्रता पर बहस तीव्र होती जा रही है, गुरु तेग बहादुर का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है।

भारत की विविधता और सहअस्तित्व की परंपरा को समझने और संजोने के लिए यह दिवस केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी है।

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