शेख हसीना: जिसके पिता ने किया बांग्लादेश को आज़ाद, उसकी बेटी अब फांसी की सजा के मुहाने पर

नई दिल्ली/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई। यह वही शेख हसीना हैं, जिनके पिता शेख मुजीबुर रहमान ने 1971 में बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। 28 सितंबर 1947 को टुंगिपारा में जन्मी हसीना ने अपने राजनीतिक जीवन में कई संकटों और संघर्षों का सामना किया, लेकिन मौजूदा फैसला उन्हें राजनीतिक इतिहास के सबसे विवादित अध्याय में ले गया है।

अगस्त 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले जुलाई आंदोलन के बाद हसीना को सत्ता से हटाया गया और वे भारत आ गईं। तब से वह भारत में रह रही हैं। न्यायाधिकरण के फैसले के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत को औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध भेजा है। यह तीसरा अनुरोध है, इससे पहले दिसंबर 2024 और मुकदमे के बाद दूसरा अनुरोध भेजा जा चुका है। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने पुष्टि की है कि ढाका ने नई दिल्ली को नया नोट वर्बल भेजा है। इसी मामले में पूर्व गृह मंत्री असादुज्ज़मान खान कमाल को भी मौत की सजा हुई है और वे भी कथित तौर पर भारत में छिपे हैं।

ढाका का कहना है कि भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत दोषी घोषित व्यक्तियों को वापस भेजा जाना चाहिए और अपराधियों को शरण देना दोनों देशों के संबंधों में असहयोगपूर्ण व्यवहार माना जाएगा। भारत ने ट्रिब्यूनल के फैसले को नोट किया है, लेकिन प्रत्यर्पण पर कोई स्पष्ट रुख नहीं दिया है। जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन के दौरान लगभग 1,400 लोगों की मौत हुई थी और उसी आधार पर मुकदमे की चार्जशीट तैयार की गई।

कैसी रही ज़िन्दगी

शेख हसीना का राजनीतिक जीवन त्रासदी और संघर्षों से भरा रहा है। 1975 में सैन्य तख्तापलट के दौरान उनके पिता, माता और परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए। उस समय हसीना और उनकी बहन विदेश में थीं। इसके बाद उन्होंने छह वर्ष भारत में निर्वासन में बिताए और 1981 में बांग्लादेश लौटकर आवामी लीग के नेतृत्व में आईं। 1996 में उनकी पार्टी को सत्ता मिली और वह पहली बार प्रधानमंत्री बनीं। उनके नेतृत्व में कई आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई।

2009 से 2024 तक लगातार सत्ता में रहते हुए उन्होंने देश में विकास कार्यों को आगे बढ़ाया, लेकिन इसी दौरान उन पर विपक्ष दमन, भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण के आरोप लगे। 2024 के जनविरोध ने अंततः उनके इस्तीफे और देश छोड़ने की स्थिति पैदा की। नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास आई, हालांकि हाल की सुरक्षा वार्ता ने माहौल में थोड़ी नरमी लाई है।

आज स्थिति यह है कि जिस परिवार ने बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई, उसी परिवार की बेटी निर्वासन में है और फांसी की सजा का सामना कर रही है। यह घटनाक्रम बांग्लादेश की राजनीति के बदलते स्वरूप, सत्ता संघर्ष और इतिहास के क्रूर विरोधाभास को सामने रखता है। शेख हसीना का अगला अध्याय अब न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर निर्भर करता है, जिसे पूरे क्षेत्र में गंभीरता से देखा जा रहा है।

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