नई दिल्ली/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। राजधानी दिल्ली में रविवार की शाम प्रदूषण के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन ने अचानक नया मोड़ ले लिया, जब प्रदर्शनकारियों के बीच माओवादी कमांडर माडवी हिडमा के पोस्टर और नारे सामने आए। भीड़ में “कितने हिडमा मारोगे”, “हर घर से निकलेगा हिडमा” और “अमर रहे हिडमा” जैसे नारे गूंजे, जिसके बाद प्रदर्शन का फोकस प्रदूषण विरोध से हटकर राजनीतिक और वैचारिक विवाद की ओर मुड़ गया।
घटना के बाद सोशल मीडिया पर पोस्टरों और नारों के वीडियो तेजी से वायरल हुए। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में लेते हुए प्रदर्शन खत्म कराया और कई लोगों को हिरासत में लिया। अधिकारियों का कहना है कि प्रदूषण विरोध के नाम पर कुछ समूह प्रदर्शन को भटकाने की कोशिश कर रहे थे।
माडवी हिडमा, जिनकी तस्वीर पोस्टरों पर दिखाई गई, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के सुकमा क्षेत्र का एक शीर्ष माओवादी कमांडर था। उसका जन्म लगभग 1981 में एक गरीब गोंड आदिवासी परिवार में हुआ था। 16 साल की उम्र में वह माओवादी संगठन से जुड़ा और गुरिल्ला युद्ध की रणनीतियां सीखीं। लगभग 25 वर्षों तक उसने जंगलों में माओवादी गतिविधियों का नेतृत्व किया और कई हमलों की योजना बनाई।

हिडमा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का प्रमुख माना जाता था। वह माओवादी संगठन की केंद्रीय समिति के सबसे युवा सदस्यों में शामिल था और घात लगाकर हमला करने की रणनीति का मास्टरमाइंड माना जाता था। 2010 के दंतेवाड़ा हमले में उसकी भूमिका सबसे अधिक चर्चित रही, जिसमें CRPF के 76 जवान शहीद हुए थे।
18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में माडवी हिडमा मारा गया था। उसी कार्रवाई में उसकी पत्नी और कुछ साथी भी मारे गए थे। सुरक्षा एजेंसियों ने इसे माओवाद विरोधी अभियान की एक बड़ी सफलता कहा था।
लेकिन दिल्ली के प्रदर्शन में उसके समर्थन में लगे पोस्टरों ने नई बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हिडमा एक आदिवासी व्यक्ति था जिसने अपने समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका तर्क है कि आदिवासी क्षेत्रों में दशकों से शोषण और उपेक्षा रही है, और हिडमा उस संघर्ष का प्रतीक बन गया था।
दूसरी ओर पुलिस और सरकार का रुख स्पष्ट है—वे इसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं। अधिकारियों का कहना है कि किसी हिंसक और प्रतिबंधित संगठन से जुड़े व्यक्ति की महिमा का प्रचार करना गंभीर अपराध है और प्रदूषण विरोध प्रदर्शन को इस बहाने उग्र बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी आंदोलनों के भीतर बढ़ते वैचारिक टकराव और सामाजिक विभाजन को भी उजागर करती है। प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर शुरू हुआ यह आंदोलन अपने उद्देश्य से भटक गया और एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया।
दिल्ली की जहरीली हवा और बढ़ते AQI स्तर के बीच शुरू हुए इस विरोध से उम्मीद थी कि प्रदूषण नियंत्रण पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन हिडमा के समर्थन में लगे पोस्टर और नारे अब राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बन गए हैं।


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