संविधान निर्माण की उस प्रक्रिया की पड़ताल, जिसने देश की बुनियाद गढ़ी
भारत का संविधान अक्सर डॉ. बी.आर. अंबेडकर के नाम से जुड़कर प्रस्तुत किया जाता है, और यह स्वाभाविक भी है—क्योंकि उन्होंने इसकी ड्राफ्टिंग कमेटी का नेतृत्व किया और दस्तावेज़ को विधिक मजबूती दी। लेकिन संविधान केवल अंबेडकर का लिखा हुआ ग्रंथ नहीं था। यह एक लंबी प्रक्रिया, विभिन्न विशेषज्ञताओं और कई आवाज़ों से मिलकर बना एक सामूहिक प्रयास था। सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्या संविधान अंबेडकर का है, या फिर अंबेडकर संविधान की उस व्यापक टीम का हिस्सा हैं जिसने यह दस्तावेज़ बनाया? इसी संतुलित दृष्टिकोण को समझना इस विषय पर किसी भी चर्चा की पहली शर्त है।
ड्राफ्टिंग कमेटी: मूल मसौदा तैयार करने वाली टीम
29 अगस्त 1947 को गठित ड्राफ्टिंग कमेटी में कुल सात सदस्य और एक अध्यक्ष शामिल थे। अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर थे। साथ में एन. गोपालस्वामी आयंगार, के.एम. मुंशी, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, मोहम्मद सादुल्ला, बी.एल. मिटर और डी.पी. खैतान सदस्य थे। बाद में स्वास्थ्य एवं परिस्थितियों के चलते बी.एल. मिटर की जगह एन. माधव राव और डी.पी. खैतान के निधन पर टी.टी. कृष्णमाचारी को समिति में शामिल किया गया। इन सदस्यों ने अंबेडकर के साथ मिलकर संविधान की भाषा, धाराओं, संशोधनों और विधिक संरचना पर विस्तृत काम किया।
दस्तावेज़ का स्वरूप और कलात्मक पहचान
संविधान केवल कानूनी पाठ नहीं था। इसकी दृश्य पहचान भी महत्त्वपूर्ण थी। नंदलाल बोस ने प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक चित्रांकन किया। बी. रॉय चौधरी ने विभिन्न अध्यायों की शुरुआत के लिए कला-आधारित प्रतीक बनाए। शांतिनिकेतन के कलाकारों की टीम ने पृष्ठ-सज्जा और दृश्य प्रस्तुति को अंतिम रूप दिया। इन कलात्मक तत्वों ने संविधान को कानूनी दस्तावेज़ से आगे ले जाकर एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित किया।
संविधान सभा की बहसें और निर्णायक योगदान
नवंबर 1946 से नवंबर 1949 तक हुए 165 से अधिक सत्रों में संविधान सभा ने हजारों सुझावों पर चर्चा की। सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सत्रों का संचालन स्थिरता और संतुलन के साथ किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव और निदेशक सिद्धांतों की दिशा तय की। सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघीय ढांचे और राज्यों के एकीकरण पर मुख्य हस्तक्षेप किए। एच.वी. कामथ, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, महावीर त्यागी और के.एम. मुंशी जैसे सदस्यों ने विभिन्न धाराओं, संशोधनों और शक्तियों पर महत्वपूर्ण बहसें कीं। इन चर्चाओं ने मौलिक अधिकारों, संघीय संरचना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्यों का स्वरूप तय किया।
पूर्ववर्ती दस्तावेज़ और वैचारिक स्रोत
संविधान कई पूर्ववर्ती रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ों से प्रभावित रहा—जैसे मोतीलाल नेहरू समिति रिपोर्ट 1928, कराची प्रस्ताव 1931 और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935। अमेरिकी, फ्रांसीसी और सोवियत संविधानों के कुछ सिद्धांतों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। राजा राम मोहन राय, विद्यासागर, जोतिराव फुले और तिलक जैसे सामाजिक सुधारकों की सोच ने भी संवैधानिक विचारधारा को दिशा दी।
समाज, संस्थाएँ और विविध समुदायों का योगदान
संविधान केवल नेताओं की मान्यताओं का दस्तावेज़ नहीं था। विभिन्न प्रांतों से आए सुझाव, सामाजिक संगठनों की राय, महिला समूहों की भागीदारी, उद्योग और कृषि क्षेत्र के इनपुट तथा शिक्षाविदों के विश्लेषण ने इसे अधिक प्रतिनिधित्वकारी बनाया। इस प्रक्रिया ने दस्तावेज़ को वास्तविक भारतीय आवश्यकताओं और विविध सामाजिक संरचनाओं के अनुरूप ढाला।
संविधान—एक व्यक्ति नहीं, एक प्रक्रिया
डॉ. अंबेडकर संविधान के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक थे, लेकिन यह दस्तावेज़ केवल किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं था। यह विचारों, बहसों, विशेषज्ञताओं और सामाजिक अनुभवों का संयुक्त परिणाम था। इसलिए इसे “अंबेडकर का संविधान” कहना एक सम्मान है, लेकिन इसे “भारत के लोगों का संविधान” कहना अधिक सटीक और ऐतिहासिक रूप से सही है। अंबेडकर इस महान प्रक्रिया के केंद्रीय चेहरे थे—और संविधान इस सामूहिक यात्रा की अंतिम उपलब्धि।


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