1510… गोवा की कहानी यहीं से मोड़ लेती है। पुर्तगाली कमांडर अफोंसो डी अलबुकरके भारत पहुंचे थे मलक्का, अर्दन और ओरमूस जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों पर कब्जा करने। उनके लक्ष्य में गोवा था ही नहीं। लेकिन स्थानीय हिंदू नेता टिमोजी ने हालात बताए—बीजापुर के सुल्तान यूसुफ आदिल खान की मौत, कमजोर किला, परेशान स्थानीय हिंदू जनता और सत्ता का खालीपन। इसी जानकारी ने पूरा खेल बदल दिया और अलबुकरके ने गोवा पर हमला करने का फैसला ले लिया।
फरवरी 1510 में पुर्तगाली जहाज़ मंडोवी नदी किनारे रुके। पहला निशाना पांगीम किला था, जिसकी रक्षा तुर्की कमांडर युसुफ गुर्गिज और करीब 400 सैनिक कर रहे थे। किला ज्यादा देर नहीं टिक पाया। किले के गिरते ही स्थानीय सरदारों का रुख बदल गया और वे पुर्तगालियों के साथ खड़े हो गए। 17 फरवरी को बिना बड़े मुकाबले के पूरा गोवा पुर्तगाल के कब्जे में था। अलबुकरके ने शहर में लूट रोकने और जनता को नुकसान न पहुंचाने का आदेश दिया, जिससे उन्हें स्थानीय समर्थन मिला।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ महीनों बाद सुल्तान के वारिस इस्माइल आदिल शाह ने फौज भेजकर गोवा वापस लेने की कोशिश की। पुर्तगालियों को पीछे हटना पड़ा। फिर 25 नवंबर 1510 को अलबुकरके बड़ी सेना और तैयारी के साथ लौटे। निर्णायक लड़ाई हुई और गोवा फिर से पुर्तगाल के हाथ में आ गया। यहीं से पुर्तगाल ने गोवा को सिर्फ सैन्य ठिकाना नहीं, बल्कि स्थायी उपनिवेश बना दिया। आगे चलकर यही जगह उनके भारतीय साम्राज्य की राजधानी बनी। गोवा 451 साल, यानी 1961 तक पुर्तगाल के अधीन रहा।
इस जीत का असर दूर तक गया। हिंद महासागर के व्यापार मार्गों पर पुर्तगाल की पकड़ मजबूत हुई। मसाला व्यापार, नौसैनिक शक्ति और एशिया में उनका दखल अचानक बढ़ गया। टिमोजी के सहयोग ने उन्हें ऐसा ठिकाना दिया, जहां से पूरी समुद्री राजनीति प्रभावित हुई।
गोवा का सांस्कृतिक चेहरा भी इसी दौर में बदला। पुर्तगाली वास्तुकला—बारोक, मैनुएलिन और गॉथिक—आज भी चर्चों और इमारतों में दिखती है। बासिलिका ऑफ बॉम जीसस, से कैथेड्रल जैसे ढांचे इसकी मिसाल हैं। कार्निवल जैसे त्यौहार, फाडो और मंडो संगीत, कई सामाजिक परंपराएं आज भी गोवा की पहचान का हिस्सा हैं। कोंकणी भाषा में सैकड़ों पुर्तगाली शब्द घुल चुके हैं। कई परिवार अब भी पुर्तगाली नाम और रिवाज निभाते हैं। कानूनी ढांचे में भी इसका प्रभाव बना हुआ है—गोवा में आज भी पुर्तगाली सिविल लॉ लागू है, संपत्ति और विरासत के मामले भारत के बाकी हिस्सों से अलग तरीके से तय होते हैं।
और अब बात आज की…
राजनीतिक रूप से गोवा पूरी तरह भारत का हिस्सा है, लेकिन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक स्तर पर उसका पुर्तगाल से रिश्ता आज भी गहरा है। पुर्तगाल के कब्जे के खत्म होने के बाद भी भाषा, वास्तुकला, खान-पान, त्योहार और जीवनशैली में पुर्तगाली रंग मौजूद है। कई पुर्तगाली मूल के परिवार आज भी गोवा में बसे हैं और पुर्तगाल से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम और पर्यटन लगातार जारी रहते हैं। यह दोनों जगहों के बीच एक तरह का सांस्कृतिक पुल बना हुआ है।
भारत और पुर्तगाल के संबंध अब सामान्य और सौहार्दपूर्ण हैं। 1961 के बाद से दोनों देशों में शांति और सहयोग बना हुआ है। पुर्तगाली सरकार गोवा की पुर्तगाली विरासत को संरक्षित रखने और पुर्तगाली भाषा के अध्ययन को बढ़ावा देने में रुचि दिखाती है। एक और दिलचस्प पहलू—कई गोवा निवासी पुर्तगाली पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं, जिससे उन्हें यूरोपीय संघ में आवाजाही और काम के अवसर मिलते हैं। यह आर्थिक और सामाजिक संपर्कों को और मजबूत करता है।
कुल मिलाकर, गोवा और पुर्तगाल का रिश्ता अब सत्ता का नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, भाषा, पर्यटन और मानवीय जुड़ाव का है। 1510 का वह युद्ध सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं था—वह मोड़ था जिसने गोवा की पहचान, संस्कृति और भविष्य की दिशा हमेशा के लिए तय कर दी।


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