नई दिल्ली/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। हर साल सर्दियों की दस्तक के साथ ही दिल्ली की हवा में ज़हर घुलने लगता है और शुरू हो जाता है आरोप-प्रत्यारोप का एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला। सरकारें बदलती रहती हैं, चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन जो नहीं बदलता—वह है दिल्ली का दम घोंटता प्रदूषण और उस पर होने वाली सियासत। यह एक ऐसा “पास द पिलो” का खेल बन चुका है, जहां कोई भी दल जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, बस एक-दूसरे पर कीचड़ उछालकर अपना पल्ला झाड़ लेता है।
दशकों का सियासी धुआं
यह कहानी आज की नहीं है। 1990 के दशक में जब कांग्रेस और फिर भाजपा की सरकार थी, तब भी दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती थी। साल 2016 और 2017 में जब “ग्रेट स्मॉग” ने शहर को अपनी चपेट में लिया, तब आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में थी और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। 2024 में जब हवा “गंभीर प्लस” श्रेणी में पहुंची, तब भी आप सरकार में थी, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा बदल चुका था। आज नवंबर 2025 में, जब भाजपा की सरकार और नई मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सांस ले रही है, तब भी हालात जस के तस हैं।
आरोप-प्रत्यारोप का खेल
हर बार जब AQI खतरनाक स्तर को पार करता है, तो दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों पर पराली जलाने का ठीकरा फोड़ती है, वहीं केंद्र सरकार और नगर निगम (MCD) राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं। पार्टियां एक-दूसरे को अक्षम साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। कोई पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाता है, तो कोई निर्माण कार्यों पर रोक; लेकिन इन अस्थायी उपायों से जनता को कुछ दिनों की राहत के सिवा कुछ नहीं मिलता। दिल्ली सरकार और MCD के बीच का टकराव इतना बढ़ जाता है कि मुख्यमंत्री को खुद मंत्रियों के साथ सफाई और प्रदूषण नियंत्रण की निगरानी के लिए मैदान में उतरना पड़ता है—जो दिखाता है कि जमीनी स्तर पर व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है।
चुनावी फायदे और जनता का नुकसान
इस सियासी धुंध के बीच पिसती है दिल्ली की आम जनता, जो हर सांस के साथ अपने फेफड़ों में ज़हर भरने को मजबूर है। लेकिन विडंबना यह है कि जब चुनाव का समय आता है, तो यही जनता प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे को भूलकर अपने व्यक्तिगत और तात्कालिक हितों की पट्टी आंखों पर बांध लेती है। जब तक जनता अपने वोट की ताकत से सरकारों को प्रदूषण पर ठोस और स्थायी समाधान के लिए मजबूर नहीं करेगी, तब तक दिल्ली इसी तरह घुटती रहेगी—और सियासतदान “पास द पिलो” का यह जानलेवा खेल खेलते रहेंगे।


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