नई दिल्ली/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। आरएसएस चीफ मोहन भागवत के हालिया बयान ने एक बार फिर से हिंदू समाज की पहचान और उसकी सामाजिक स्थिति पर व्यापक बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है, “अगर हिंदू नहीं रहेगा तो दुनिया नहीं रहेगी,” और इस धर्म की स्थिरता और पहचान को “ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य” बताया। भागवत ने भारतीय सभ्यता की अमरता का हवाला देते हुए यूनान, मिस्र और रोम जैसे प्राचीन सभ्यों के अस्तित्व के समाप्त होने का उदाहरण दिया और साथ ही कहा कि भारत का सामाजिक नेटवर्क इतना मजबूत है कि यह सदैव बना रहेगा।
फिर भी, यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में हिंदू समाज को कोई बाहरी खतरा है? क्या कोई सचमुच हिंदुओं को खत्म करने की कोशिश कर रहा है? वास्तविकता यह है कि हिंदू समाज स्वयं के भीतर अनेक धार्मिक और सामाजिक असहमति के कारण अक्सर विभाजित रहता है। पिछले कुछ दशकों में देश में जातिगत दंगे, झगड़े और हिंसा की घटनाओं ने हिंदू समाज को आंतरिक रूप से प्रभावित किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में भारत के कई हिस्सों में जातिगत दंगें और हिंसक विरोध-प्रदर्शन दर्ज हुए हैं, जो आर्थिक-राजनीतिक संघर्ष, जमीन विवाद और सामाजिक असमानताओं से उत्पन्न हैं।
इसके अलावा, भारत में दलितों के खिलाफ अत्याचार भी एक गंभीर समस्या हैं। 2023 में दर्ज 57,789 दलित अत्याचार के मामलों में हत्या, शारीरिक हिंसा, यौन अपराध, सामाजिक बहिष्कार और सम्मान हत्या जैसी भयावह घटनाएं शामिल हैं। ये घटनाएं मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में अधिक पाई जाती हैं। हालाँकि कानून मौजूद हैं, लेकिन स्वीकार्य कमी नहीं आई है, बल्कि कुछ जगहों पर दलित अत्याचार बढ़े हैं। यह सामाजिक न्याय के लिए एक बड़ा खतरा है।
इन सबके बीच, हिंदू समाज को बाहरी खतरों की बजाय इसके अंदर व्याप्त सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, और मतभेदों से जूझना है। समाज में समरसता और एकता की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। हमें यह समझना होगा कि धार्मिक खतरे की चर्चा से ऊपर उठकर वास्तविक सामाजिक मुद्दों जैसे जातिगत विभाजन, असमानता, और हिंसा पर मुखर चर्चा को प्राथमिकता देने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार संगठन भी बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सामाजिक हिंसा किसी एक धर्म या जाति की लड़ाई नहीं बल्कि समस्त समाज की चुनौती है।
इसलिए जब कोई कहता है कि “हिंदू खत्म हो जाएगा,” तो हमें गहराई से आंकड़ों और वास्तविकताओं को देखना चाहिए। जातिगत दंगों और दलितों के खिलाफ अत्याचारों से जुड़ी सामाजिक व न्यायिक चुनौतियां हमें सूचित करती हैं कि असली खतरा समाज के भीतर निहित है। जब तक ये मुद्दे हल नहीं होंगे, तब तक समाज की स्थिरता, विकास और समानता संभव नहीं।
वास्तव में, हिंदू धर्म को वर्तमान में कोई ऐसा बाहरी खतरा सीधे तौर पर नजर नहीं आता जैसा कि अन्य धर्मों या समुदायों के संदर्भ में दिखता है। इतिहास और सामाजिक तथ्य बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती हिंदू धर्म के भीतर व्याप्त सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और मतभेद ही हैं।
हिंदू धर्म की ताकत उसकी विविधता और सहिष्णुता में है, परंतु यदि यह विविधता मतभेद और टकराव में बदल गई, तो यह धर्म कमजोर हो सकता है। इसलिए आज हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह अपने अंदर की जातिगत और सामाजिक दूरियों को कम करे, सामाजिक एकता को बढ़ाएं, और हर वर्ग को समान सम्मान एवं अवसर प्रदान करे।
जब तक ऐसा होगा, तब तक बाहरी खतरों का इस धर्म पर स्थायी असर नहीं हो सकता। खतरे आंतरिक कारणों से ज्यादा जुड़े हैं, न कि किसी बाहरी समुदाय से। उपलब्ध सरकारी आँकड़े और मानवाधिकार रिपोर्ट इस बात का समर्थन करते हैं कि धर्म की सुरक्षा और विकास के लिए सामाजिक समरसता, आंतरिक एकता, और जातीय समानता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस दिशा में हमारी सोच और प्रयासों को नए सिरे से गति देनी होगी, ताकि हम अपने समाज को मजबूत, एकसूत्रीय और समृद्ध बना सकें। सामाजिक न्याय और शांति के लिए यह आवश्यक है कि हम आत्ममंथन करें और मिलकर इस चुनौती का सामना करें। यही रास्ता हमें हिंदू समाज की स्थिरता और विकास की ओर अग्रसर करेगा।


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