मुंबई/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र का 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है, जिससे फिल्म इंडस्ट्री एक बड़े सदमे में है। वे लंबे समय से बीमार थे और कुछ दिन पहले उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत गंभीर होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था, जहां 24 नवंबर 2025 को उन्होंने अंतिम सांस ली। इस कठिन समय में पूरा देओल परिवार अस्पताल में मौजूद रहा।
धर्मेंद्र के प्रति फिल्म जगत के सम्मान और प्रेम का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान सहित बॉलीवुड के कई बड़े सितारे अस्पताल पहुंचे। उनकी उपस्थिति ने धर्मेंद्र के इंडस्ट्री में योगदान और उनके व्यक्तित्व के प्रति आदर को और मजबूत किया।
1960 में “दिल भी तेरा हम भी तेरे” फिल्म से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले धर्मेंद्र ने शुरुआती दौर में सपोर्टिंग रोल निभाए। “बॉय फ्रेंड” (1961) जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय सफर को आगे बढ़ाया। इसके बाद उनका करियर लगातार ऊंचाइयों पर पहुंचता गया और उन्होंने अपने 65 साल लंबे करियर में हिंदी सिनेमा को कई हिट, सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं।
जब दिलीप कुमार को देखकर रो पड़े थे धर्मेंद्र
धर्मेंद्र दिलीप कुमार के जबरदस्त प्रशंसक थे। उन्होंने यह बात कई इंटरव्यूज़ में स्वीकार की है कि वे बचपन से ही दिलीप साहब की फिल्में देखकर उनके जैसे बनने का सपना देखते थे।
1958 में Filmfare Talent Contest में चयन होने के बाद जब वे पहली बार बंबई पहुँचे, तो उन्हें सेट पर दिलीप कुमार से मिलने का मौका मिला। जैसे ही धर्मेंद्र ने दिलीप कुमार को सामने देखा, वे खुद को रोक नहीं पाए और भावुक होकर रो पड़े।
धर्मेंद्र ने Simi Garewal के शो “Rendezvous with Simi Garewal” में हँसते हुए कहा था:
“मैं दिलीप साहब को देखते ही बच्चे की तरह रोने लगा था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उनके सामने खड़ा हूँ।”
दिलीप कुमार ने उन्हें शांत किया, उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा:
“काम करते रहो, एक दिन तुम भी बड़े सितारे बनोगे।”
धर्मेंद्र ने Filmfare को दिए एक इंटरव्यू में इस पल को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बताया। उन्होंने कहा:
“उस एक स्पर्श ने मुझे जिंदगी भर की ऊर्जा दे दी। उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि मैं इस इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाकर रहूंगा।”
“शोले” (1975), “चुपके-चुपके” (1975), “सीता और गीता” (1972), “धरमवीर” (1977), “फूल और पत्थर” (1966), “जुगनू” (1973) और “यादों की बारात” (1973) धर्मेंद्र की फिल्मोग्राफी के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। वे ऐसे कलाकार थे जिन्होंने एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा—हर शैली में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।
धर्मेंद्र केवल एक अभिनेता नहीं थे बल्कि कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत भी रहे। उनका सरल स्वभाव, विनम्रता और इंसानियत भरा व्यवहार उन्हें इंडस्ट्री में सबसे प्रिय व्यक्तियों में शामिल करता था। फिल्मों के अलावा उन्होंने समाज सेवा और मानवता के कार्यों में भी योगदान दिया।
उनके निधन ने हिंदी फिल्म जगत को एक ऐसा युग खो दिया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। धर्मेंद्र के प्रशंसक और करीबियों ने उनके स्वस्थ होने की उम्मीद में दुआएं की थीं, लेकिन अब वे सिर्फ उनकी यादों के सहारे रह गए हैं। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा।


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