बिना शादी के 50 बरस का प्यार, दर्जनों हिट और बदहाली में मौत
भारतीय सिनेमा की दुनिया में एक ऐसा नाम है, जिसने फिल्म इंडस्ट्री को पहचान दी, बड़े स्टूडियो की नींव रखी, सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाईं, सितारों को जन्म दिया, लेकिन अपनी आखिरी सांस आर्थिक तंगी में ली। यह कहानी है चंदूलाल शाह की—एक समय मुंबई फिल्म उद्योग के सबसे प्रभावशाली, संपन्न और सफल फिल्मकार, जिनके पास कारों का बेड़ा होता था, बड़ा स्टूडियो चलता था, और फिल्म जगत में उनकी तूती बोलती थी। लेकिन 25 नवंबर 1975 को यही व्यक्ति गरीबी में बस से सफर करते हुए दुनिया छोड़ गया।
चंदूलाल शाह का जन्म 13 अप्रैल 1898 को गुजरात के जामनगर में हुआ। पढ़ाई मुंबई के सिडनहैम कॉलेज से की और करियर की शुरुआत बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में की। लेकिन सिनेमा के प्रति रुचि ने उन्हें फिल्म निर्माण की ओर खींच लिया। 1929 में उन्होंने रंजीत स्टूडियो की स्थापना की, जो उस समय भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा प्रोडक्शन हाउस बना। यही वह स्टूडियो था जिसने सामाजिक नाटकों, ऐतिहासिक फिल्मों और बाद में ध्वनि फिल्मों के दौर को आगे बढ़ाया।
चंदूलाल शाह फिल्मों के हर पहलू पर खुद नजर रखते थे। शूटिंग, पटकथा, संगीत, कलाकारों के प्रदर्शन—हर क्षेत्र में उनकी पकड़ थी। उनकी फिल्म ‘अछूत’ ने अस्पृश्यता जैसे संवेदनशील मुद्दे को बड़े पर्दे पर उठाकर समाज को झकझोरा। ‘तानसेन’ और ‘जोगन’ जैसी फिल्मों ने उन्हें शीर्ष निर्देशकों में शामिल कर दिया। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के पहले अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने उद्योग के संगठनात्मक ढांचे को मजबूती दी। अपने करियर में उन्होंने करीब 66 फिल्मों का निर्माण, निर्देशन और लेखन किया—जो उस दौर में एक बड़ी उपलब्धि थी।
इसी चमकदार सफर के बीच एक निजी अध्याय भी था, जिसने उनके जीवन को गहराई दी—अभिनेत्री गौहर के साथ उनका रिश्ता। मूक फिल्मों के दौर के बाद, जब चंदूलाल शाह फिल्म ‘गण सुंदरी’ दोबारा बना रहे थे, तभी उनकी मुलाकात गौहर से हुई। दोनों का प्रेम 1925 में पनपा और चंदूलाल शाह की मृत्यु 1975 तक चला। विवाह कभी नहीं हुआ, लेकिन गौहर ने पूरे जीवन उनका साथ नहीं छोड़ा। जब चंदूलाल की फिल्मों ने फ्लॉप होना शुरू किया, राज कपूर–नरगिस स्टारर ‘पापी’ असफल रही और आर्थिक स्थिति डगमगाई, तब भी गौहर उनके साथ रहीं। हालात इतने खराब हो गए कि स्टूडियो, बंगला, गाड़ियां सब बिक गईं, और चंदूलाल शाह कर्ज में डूब गए। उसी समय गौहर ने अपने जेवर तक बेच दिए और उनकी मदद की।
लेकिन लगातार असफलताओं, जुए और घुड़दौड़ में पैसे लगाने ने उनकी स्थिति और खराब कर दी। एक समय जिनके पास करोड़ों की संपत्ति थी, वही चंदूलाल शाह अपने अंतिम वर्षों में बसों से यात्रा करते थे, इलाज के पैसे तक नहीं बचे थे। 25 नवंबर 1975 को आर्थिक तंगी में उनकी मौत हुई। एक ऐसा व्यक्ति जिसने भारतीय सिनेमा को दिशा दी, बड़े स्टूडियो सिस्टम खड़ा किया, समाज को फिल्मों के माध्यम से संदेश दिया, वह अकेलेपन और गरीबी में दुनिया से चला गया।
चंदूलाल शाह का जीवन भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाता है—एक तरफ शिखर, चमक-दमक, सफलता और प्रभाव, तो दूसरी तरफ गहरी गिरावट, अकेलापन और आर्थिक बर्बादी। उनकी प्रेम कहानी भले ही विवाह तक न पहुंची हो, लेकिन गौहर का समर्पण यह साबित करता है कि स्टारडम और शोहरत के पीछे भी इंसानी रिश्तों की सच्चाई मौजूद रहती है।
उनका सफर यह याद दिलाता है कि सिनेमा की दुनिया जितनी चमकदार दिखती है, उतनी ही कठोर भी होती है। सफलता और असफलता के बीच की दूरी कभी-कभी बहुत कम होती है। चंदूलाल शाह का नाम आज भी भारतीय फिल्म इतिहास में सम्मान से लिया जाता है, और उनकी मौत फिल्म जगत की सबसे दुखद कहानियों में दर्ज है।


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