कहाँ गये 16 करोड़ के सरकारी सुधीर

देश के प्राइवेट चैनल पर हुआ पुतिन का इंटरव्यू, मुहं ताक रहा सरकारी मीडिया

देश के एक प्राइवेट चैनल पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का इंटरव्यू प्रसारित हुआ और सरकारी मीडिया केवल दूर से इसे देखता रह गया। इसी के साथ सोशल मीडिया पर एक सवाल तेजी से उभरने लगा कि आखिर 16 करोड़ के सरकारी सुधीर कहाँ गये। यह अचानक पैदा हुआ सवाल नहीं है। इसके पीछे दो हालिया घटनाएँ हैं। पहली घटना दूरदर्शन द्वारा एक स्टार एंकर को लगभग 15 से 16 करोड़ रुपये सालाना के पैकेज पर योजना बनाकर लाने का दावा और दूसरी घटना पुतिन का भारत यात्रा से ठीक पहले निजी मीडिया समूह को दिया गया वर्ल्ड एक्सक्लूसिव इंटरव्यू। एक तरफ जनता के टैक्स से चलने वाला पब्लिक ब्रॉडकास्टर अपनी विश्वसनीयता और प्रभाव खोता दिखाई दे रहा है और दूसरी तरफ प्राइवेट चैनल वैश्विक सुर्खियाँ बटोर रहा है। इस पूरे समीकरण के बीच खड़ा है आम दर्शक, जो यह समझने की कोशिश कर रहा है कि यह सब किसके हित में हो रहा है।

दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो की पैरेंट संस्था प्रसार भारती के बारे में पिछले महीनों में रिपोर्ट सामने आई कि उसने सुधीर चौधरी की कंपनी के साथ एक प्राइम टाइम शो के लिए लगभग 15 से 16 करोड़ रुपये सालाना की डील पर सहमति बनाई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह शो सप्ताह में पाँच दिन एक घंटे के स्लॉट में प्रसारित किया जाना था। इस प्रस्ताव पर प्रसार भारती के भीतर ही कई कानूनी और प्रशासनिक आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं, फिर भी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इस निर्णय को लेकर पूर्व प्रसार भारती सीईओ जवाहर सरकार सहित कई अनुभवी मीडिया विशेषज्ञों ने इसे टैक्सपेयर के पैसे की अनावश्यक बर्बादी और संस्थान की प्राथमिकता से भटकना बताया। समर्थकों का तर्क इसके विपरीत यह रहा कि मार्केट रेट और स्टार पावर के हिसाब से यह एक सामान्य और आवश्यक कदम है। फिर भी मूल प्रश्न बना हुआ है कि क्या एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर का उद्देश्य स्टार एंकर खरीदना है या विश्वसनीय और संतुलित पत्रकारिता प्रस्तुत करना।

इसी बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत यात्रा से ठीक पहले जो विस्तृत इंटरव्यू दिया, वह सरकारी मीडिया को नहीं बल्कि एक निजी मीडिया नेटवर्क को मिला। क्रेमलिन की आधिकारिक वेबसाइट पर इस इंटरव्यू को इंडिया टुडे और आज तक के साथ हुई बातचीत के रूप में दर्ज किया गया। इसे केवल एक मीडिया इंटरव्यू नहीं, बल्कि एक औपचारिक कूटनीतिक दस्तावेज़ जैसा महत्व दिया गया। पुतिन के बयान, जैसे भारत को महान शक्ति कहना, रूस से तेल खरीदने के भारत के अधिकार का बचाव करना और डोनबास पर नियंत्रण की चर्चा, विश्वभर के मीडिया में व्यापक रूप से उद्धृत हुए। लेकिन स्रोत के रूप में हर जगह उसी निजी चैनल का नाम सामने आया। इस दौरान दूरदर्शन केवल एक बाहरी दर्शक की भूमिका में दिखाई दिया, जबकि दशकों से उसकी पहचान भारत की आधिकारिक आवाज़ के रूप में रही है।

दूरदर्शन पर 16 करोड़ रुपये की संभावित डील का बचाव करने वाले लोगों का कहना है कि इससे चैनल की टीआरपी बढ़ेगी, युवा दर्शक जुड़े रहेंगे और सरकारी नीतियों और दृष्टिकोण को अधिक प्रभावी ढंग से संप्रेषित किया जा सकेगा। किंतु यदि इतनी बड़ी राशि में लाए गये स्टार एंकर के बावजूद देश की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बातचीत किसी निजी चैनल को मिले और वही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उद्धृत हो, तो पब्लिक ब्रॉडकास्टर की वास्तविक भूमिका क्या रह जाती है। क्या वह केवल सरकारी प्रचार का मंच बनकर रह जाना चाहिए। यह भी विचारणीय है कि जिस कॉन्ट्रैक्ट नोट की जानकारी लीक होने पर प्रसार भारती ने एफआईआर दर्ज करवाई, वही दस्तावेज़ जनता के पैसे से होने वाले खर्च की जानकारी का एकमात्र आधार भी था। पारदर्शिता के स्थान पर डर और दबाव की यह स्थिति पब्लिक सर्विस मीडिया की मूल भावना के प्रतिकूल प्रतीत होती है।

पुतिन इंटरव्यू के दौरान निजी चैनल की ओर से पूछे गये एक हल्के और सत्ता अनुकूल प्रश्न पर पुतिन ने टिप्पणी की कि यह असमय किया गया प्रश्न है। इसे कई दर्शकों ने एक्सेस जर्नलिज्म की सीमा और उसकी कमियों को उजागर करने वाला पल माना। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि पत्रकारिता की गुणवत्ता केवल इस आधार पर तय नहीं होती कि मीडिया सरकारी है या निजी। पत्रकारिता वास्तविक अर्थों में तभी सार्थक होती है जब वह सत्ता से दूरी रखे और जनता के हित से निकटता बनाए रखे। दूरदर्शन पर सुधीर चौधरी जैसे विवादास्पद चेहरे को लाने का निर्णय, जिन्हें पहले से सरकार समर्थक छवि के लिए जाना जाता है, पब्लिक ब्रॉडकास्टर और जनता के बीच इस दूरी को और बढ़ाता है। पब्लिक ब्रॉडकास्टर की प्रासंगिकता तभी लौट सकती है जब वह टैक्सपेयर के पैसों से खरीदा गया सरकारी प्रवक्ता नहीं, बल्कि जनता के सवाल पूछने वाला स्वतंत्र और विश्वसनीय मंच बने।

इस पूरे विवाद के अंत में सबसे बड़ा प्रश्न अब भी वही बना हुआ है। जिस निजी चैनल ने इंटरव्यू किया वह बाजार और अपने दर्शक समूह के प्रति जवाबदेह है। लेकिन दूरदर्शन जनता के टैक्स से चलता है, इसलिए उसकी जवाबदेही सरकार के बजाय दर्शक के प्रति होनी चाहिए। जब 16 करोड़ के एंकर भी देश की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बातचीत के समय साइडलाइन दिखते हैं, तो यह बहस किसी एक व्यक्ति या कॉन्ट्रैक्ट से आगे बढ़कर पूरी मीडिया नीति पर सवाल खड़ा कर देती है। शायद अब सवाल यह नहीं रह गया कि 16 करोड़ के सरकारी सुधीर कहाँ गये, बल्कि यह कि जनता के 16 करोड़ रुपयों से किस प्रकार की पत्रकारिता खरीदी जा रही है और क्या उसमें दर्शक की आवाज़ के लिए कोई स्थान बचा है।

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