लाइफस्टाइल/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स।
आधुनिक चिकित्सा ने इंसान की उम्र बढ़ा दी है, लेकिन इसके साथ एक कठिन नैतिक प्रश्न भी सामने आया है। जब किसी व्यक्ति के ठीक होने की कोई उम्मीद न हो और वह लंबे समय तक असहनीय पीड़ा में जीवन से जूझ रहा हो, तो क्या उसे गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए? हाल के दिनों में भारत में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद यह सवाल फिर से चर्चा में आ गया है। अदालत ने एक गंभीर रूप से बीमार मरीज के मामले में जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी, जिससे इच्छामृत्यु और “राइट टू डाई विद डिग्निटी” यानी गरिमा के साथ मरने के अधिकार पर नई बहस शुरू हो गई है।
इच्छामृत्यु का विचार नया नहीं है, लेकिन आधुनिक कानूनी रूप में इसे सबसे पहले यूरोप में स्वीकार किया गया। 2002 में नीदरलैंड दुनिया का पहला देश बना जिसने इच्छामृत्यु को कानून के तहत वैध बनाया। इस कानून के तहत डॉक्टर कुछ सख्त शर्तों के साथ मरीज की इच्छा पर जीवन समाप्त करने में मदद कर सकते हैं। इसके बाद बेल्जियम और लक्ज़मबर्ग जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों में यह व्यवस्था बेहद कड़े नियमों के तहत लागू होती है, जहाँ कई डॉक्टरों की राय और मरीज की स्पष्ट सहमति जरूरी होती है।
यूरोप के बाहर भी कई देशों में इस विषय पर अलग-अलग प्रयोग हुए। स्विट्ज़रलैंड ने “असिस्टेड सुसाइड” यानी सहायता प्राप्त आत्महत्या को सीमित रूप से अनुमति दी, जहाँ व्यक्ति अपनी इच्छा से जीवन समाप्त करने का निर्णय ले सकता है। अमेरिका में यह अधिकार पूरे देश में नहीं बल्कि कुछ राज्यों में लागू है। ओरेगन ने 1997 में सबसे पहले “डेथ विद डिग्निटी एक्ट” लागू किया और उसके बाद कैलिफोर्निया, वाशिंगटन, कोलोराडो और कुछ अन्य राज्यों ने भी इसी तरह के कानून अपनाए। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में भी इच्छामृत्यु को नियंत्रित शर्तों के साथ अनुमति दी गई है।
हालांकि दुनिया के कई देशों में यह अभी भी बेहद विवादास्पद मुद्दा है। धार्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से कई लोग इसे जीवन के मूल अधिकार के खिलाफ मानते हैं। उनका तर्क है कि किसी भी परिस्थिति में जीवन समाप्त करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर समर्थकों का कहना है कि जब चिकित्सा विज्ञान किसी व्यक्ति को ठीक नहीं कर सकता और वह असहनीय दर्द में जी रहा हो, तब उसे गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए।
भारत में इच्छामृत्यु की बहस धीरे-धीरे न्यायपालिका के फैसलों के माध्यम से विकसित हुई। 2011 में अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार “पैसिव इच्छामृत्यु” यानी जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देने का सिद्धांत स्वीकार किया। हालांकि यह अनुमति बेहद सीमित परिस्थितियों में दी गई थी और अदालत की मंजूरी जरूरी थी। इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसी फैसले में “लिविंग विल” यानी वह दस्तावेज़ भी मान्य किया गया जिसमें व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में उसके साथ किस तरह का इलाज किया जाए।
हाल के फैसले ने इस बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। अदालत ने एक विशेष मरीज के मामले में जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी और यह संकेत दिया कि अत्यधिक पीड़ा और लाइलाज बीमारी के मामलों में न्यायपालिका मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि भारत में अभी भी “एक्टिव इच्छामृत्यु” यानी डॉक्टर द्वारा सीधे जीवन समाप्त करने की अनुमति नहीं है। केवल पैसिव इच्छामृत्यु यानी उपचार रोकने या लाइफ सपोर्ट हटाने को सीमित परिस्थितियों में स्वीकार किया गया है।
इस पूरे मुद्दे का सबसे जटिल पहलू यह है कि यह सिर्फ कानून या चिकित्सा का प्रश्न नहीं है। इसमें नैतिकता, धर्म, परिवार और सामाजिक संवेदनाओं की भी बड़ी भूमिका है। भारत जैसे समाज में जहाँ जीवन को पवित्र माना जाता है, वहाँ इच्छामृत्यु का सवाल और भी संवेदनशील हो जाता है। यही वजह है कि अदालतें भी इस विषय पर बहुत सावधानी से कदम बढ़ाती रही हैं।
दुनिया के कई देशों के अनुभव बताते हैं कि इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देना आसान फैसला नहीं होता। इसके लिए स्पष्ट नियम, चिकित्सा विशेषज्ञों की सहमति और दुरुपयोग रोकने के मजबूत तंत्र की जरूरत होती है। भारत में भी यह बहस अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने जरूर इस चर्चा को नई दिशा दी है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि आने वाले समय में इस विषय पर और कानूनी तथा सामाजिक विमर्श होगा।
आखिरकार सवाल केवल मृत्यु का नहीं, बल्कि गरिमा का है। क्या किसी व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिम क्षणों के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए? यह वही प्रश्न है जो दुनिया भर के समाजों और न्यायालयों को लगातार सोचने पर मजबूर कर रहा है।


Leave a Reply