एडिटोरियल/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। भारत की राजनीति और नीतियों पर चर्चा जब भी होती है, एक सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या भारत वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र नीति-निर्माण करता है या फिर वैश्विक शक्तियों का दबाव इसमें कहीं न कहीं भूमिका निभाता है। हाल के वर्षों में यह सवाल विशेष रूप से तब उठने लगा जब कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अमेरिका की प्रतिक्रियाएं और भारत की नीतिगत दिशा लगभग समान दिखाई देने लगीं। इससे एक नई बहस शुरू हुई कि क्या अमेरिका सीधे या परोक्ष रूप से भारत की नीतियों को प्रभावित करता है।
असल में वैश्विक राजनीति में “हस्तक्षेप” हमेशा सीधे आदेश या नियंत्रण के रूप में नहीं होता। कई बार यह आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक दबाव के रूप में सामने आता है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों में से एक है। इसलिए उसकी विदेश नीति का असर स्वाभाविक रूप से कई देशों पर पड़ता है, जिनमें भारत भी शामिल है।
भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच करीबी बढ़ी है। इसी वजह से कई बार भारत के फैसलों को अमेरिका के साथ रणनीतिक तालमेल के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर नीतिगत निर्णय सीधे अमेरिकी दबाव का परिणाम हो।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में “प्रभाव” और “हस्तक्षेप” दो अलग चीजें हैं। उदाहरण के तौर पर जब कोई शक्तिशाली देश व्यापार समझौते, रक्षा साझेदारी या प्रतिबंधों के जरिए किसी देश को प्रभावित करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सामान्य हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब कोई देश दूसरे देश के आंतरिक मामलों या नीतियों को सीधे नियंत्रित करने की कोशिश करे, तब उसे हस्तक्षेप कहा जाता है।
भारत के मामले में यह बहस कई संदर्भों में उठती रही है। कभी यह व्यापार नीतियों को लेकर होती है, कभी तकनीकी नियमों को लेकर और कभी मानवाधिकार या लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर। अमेरिका अक्सर इन विषयों पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त करता है। इससे कई बार भारतीय राजनीतिक हलकों में यह धारणा बनती है कि अमेरिका भारत की नीति दिशा पर टिप्पणी कर रहा है।
हालांकि भारत सरकार का आधिकारिक रुख हमेशा यही रहा है कि भारत अपनी विदेश और घरेलू नीतियां पूरी तरह स्वतंत्र रूप से तय करता है। भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति लंबे समय से उसकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण सिद्धांत रही है। इसका मतलब यह है कि भारत किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेना चाहता है।
फिर भी यह भी सच है कि आज की वैश्विक दुनिया में कोई भी देश पूरी तरह अलग-थलग होकर निर्णय नहीं ले सकता। व्यापार, सुरक्षा, तकनीक और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में देशों की परस्पर निर्भरता इतनी बढ़ चुकी है कि बड़े देशों की राय और दबाव कई बार नीति-निर्माण को प्रभावित करते हैं। अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ जैसे बड़े शक्ति केंद्र अक्सर वैश्विक नियमों और मानकों को आकार देते हैं।
भारत के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह खुद भी अब एक उभरती वैश्विक शक्ति माना जाता है। ऐसे में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश भारत के साथ साझेदारी को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भी अमेरिका भारत के साथ सहयोग को बढ़ावा देता है। इस कारण कई नीतिगत मुद्दों पर दोनों देशों के हित एक-दूसरे के करीब दिखाई देते हैं।
लेकिन यही स्थिति आलोचकों के लिए सवाल भी पैदा करती है। उनका तर्क है कि अगर भारत किसी वैश्विक शक्ति के साथ बहुत ज्यादा रणनीतिक रूप से जुड़ जाता है, तो उसकी स्वतंत्र नीति-निर्माण क्षमता पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर समर्थकों का कहना है कि वैश्विक साझेदारी का मतलब यह नहीं कि कोई देश अपनी संप्रभुता खो देता है।
दरअसल सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है। वैश्विक राजनीति में हर देश अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश करता है और प्रभाव के अलग-अलग साधनों का इस्तेमाल करता है। अमेरिका भी इससे अलग नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए अपनी नीतियों पर अंतिम फैसला खुद करना ही उसकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा है।
इसलिए असली सवाल शायद यह नहीं है कि अमेरिका भारत की नीतियों में हस्तक्षेप करता है या नहीं। असली सवाल यह है कि भारत बदलती वैश्विक राजनीति के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को किस तरह संतुलित रखता है। क्योंकि लोकतंत्र में “हम भारत के लोग” का अर्थ तभी मजबूत रहता है, जब देश के बड़े फैसले अंततः उसी जनता के हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएं।


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