ईरान बनाम अमेरिका-इज़राइल: कितने दिन लड़ सकता है ईरान?

इंटरनेशनल/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अगर अमेरिका और इज़राइल एक साथ युद्ध में हों तो क्या ईरान वास्तव में लंबे समय तक लड़ सकता है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य ताकत के मामले में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है और इज़राइल भी अत्याधुनिक तकनीक और मिसाइल रक्षा प्रणाली से लैस है। फिर भी कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह युद्ध किसी एक पक्ष की जल्दी जीत से खत्म होने वाला संघर्ष नहीं हो सकता।

युद्ध कैसे शुरू हुआ

फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया। इस ऑपरेशन में ईरान के मिसाइल ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। शुरुआती हमलों में सैकड़ों लक्ष्यों पर बमबारी की गई और ईरान के कई सैन्य ढांचे को नुकसान पहुँचा।

इसके जवाब में ईरान ने इज़राइल और क्षेत्र के अन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। शुरुआती दिनों में उसने लगभग 300 मिसाइलें दागीं, हालांकि इनमें से कई को इज़राइल और अमेरिकी रक्षा प्रणालियों ने हवा में ही रोक लिया।

ईरान की असली रणनीति क्या है

सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने अपनी सेना को “लंबे युद्ध” के लिए तैयार किया है, न कि किसी छोटे और तेज युद्ध के लिए। उसकी रणनीति यह है कि वह प्रत्यक्ष टकराव के बजाय समय को हथियार की तरह इस्तेमाल करे और विरोधी देशों पर लगातार दबाव बनाए रखे।

ईरान की ताकत उसके पारंपरिक हथियारों से ज्यादा उसके “असममित युद्ध” यानी असमान रणनीति में मानी जाती है। इसमें शामिल हैं

-लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें

-सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन

-क्षेत्रीय सहयोगी समूह

-समुद्री मार्गों और तेल व्यापार पर दबाव

ईरान की कुछ मिसाइलों की मारक क्षमता 1000 से 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है, जिससे वह इज़राइल और मध्य-पूर्व के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है।

युद्ध कितने समय तक चल सकता है

अमेरिकी नेतृत्व ने शुरुआत में अनुमान लगाया था कि यह सैन्य अभियान चार से पाँच सप्ताह तक चल सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की अवधि सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक क्षमता से तय होती है।

युद्ध के पहले दस दिनों में ही ईरान के कई मिसाइल और ड्रोन ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा और उसके हमलों की संख्या काफी कम हो गई। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह जरूरी नहीं कि उसकी क्षमता खत्म हो गई हो। वह अपने हथियारों को बचाकर लंबी लड़ाई के लिए भी रख सकता है।

क्यों दोनों पक्ष “जीत” का दावा कर सकते हैं

-भू-राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के युद्धों में जीत का अर्थ केवल सैन्य विजय नहीं होता।

-अगर अमेरिका और इज़राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोक देते हैं तो वे इसे जीत मानेंगे।

-लेकिन अगर ईरान सरकार सत्ता में बनी रहती है और लंबे समय तक प्रतिरोध जारी रखती है तो वह भी इसे अपनी जीत बता सकता है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे संघर्षों में केवल “जिंदा बच जाना” भी रणनीतिक जीत मानी जाती है, खासकर तब जब विरोधी पक्ष को भारी आर्थिक और राजनीतिक कीमत चुकानी पड़े।

असली खतरा क्या है

सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह संघर्ष केवल तीन देशों तक सीमित न रहे। मध्य-पूर्व के कई देश, समुद्री तेल मार्ग और वैश्विक व्यापार इस युद्ध से प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

ईरान अमेरिका या इज़राइल जैसी सैन्य ताकत नहीं है, लेकिन उसकी रणनीति अलग है। वह सीधे ताकत की लड़ाई नहीं बल्कि समय, भूगोल और क्षेत्रीय राजनीति का इस्तेमाल करता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि ईरान कितने दिन लड़ सकता है। असली सवाल यह है कि क्या कोई भी पक्ष इस युद्ध को जल्दी खत्म कर पाएगा या यह संघर्ष मध्य-पूर्व को लंबे समय तक अस्थिर करता रहेगा।

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