नेशनल/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। भारत में विदेश में नौकरी का सपना लंबे समय से युवाओं को आकर्षित करता रहा है। बेहतर वेतन, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की उम्मीद कई युवाओं को जोखिम लेने पर मजबूर कर देती है। लेकिन हाल के वर्षों में यही सपना कई लोगों के लिए डरावने जाल में बदलता दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश से सामने आया एक मामला इस बात का संकेत है कि कैसे फर्जी नौकरी के नाम पर युवाओं को विदेश भेजकर उन्हें साइबर अपराध के अड्डों में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा था।
हाल ही में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने कानपुर के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जिस पर आरोप है कि उसने भारतीय युवाओं को दक्षिण-पूर्व एशिया के तथाकथित “स्कैम कंपाउंड्स” तक पहुँचाने का नेटवर्क बनाया हुआ था। जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी युवाओं को विदेश में डेटा एंट्री, कस्टमर सपोर्ट और अन्य आईटी से जुड़ी नौकरियों का लालच देता था। इसके लिए उनसे लगभग 300 से 400 डॉलर तक की रकम भी ली जाती थी और फिर उन्हें इंटरव्यू तथा नौकरी का भरोसा दिलाकर विदेश भेज दिया जाता था।
लेकिन विदेश पहुँचने के बाद कहानी पूरी तरह बदल जाती थी। रिपोर्टों के मुताबिक कई युवाओं को दिल्ली के रास्ते कंबोडिया और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भेजा गया, जहां उन्हें साइबर धोखाधड़ी चलाने वाले ठिकानों में काम करने के लिए मजबूर किया गया। इन जगहों को अक्सर “साइबर स्कैम कंपाउंड्स” कहा जाता है, जहां लोगों के पास न तो आज़ादी होती है और न ही वापस लौटने का विकल्प।
जांच एजेंसियों के अनुसार इन जगहों पर पहुंचने के बाद पीड़ितों के पासपोर्ट जब्त कर लिए जाते थे और कई मामलों में उन्हें डराया-धमकाया जाता था। कुछ को बंदी बनाकर रखा गया और उनसे ऑनलाइन ठगी कराने के लिए दबाव डाला गया। इस तरह वे धीरे-धीरे एक तरह की “साइबर गुलामी” में फंस जाते थे, जहां उन्हें लोगों को धोखा देने वाले कॉल या ऑनलाइन स्कैम करने पड़ते थे।
दरअसल दक्षिण-पूर्व एशिया में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे स्कैम कंपाउंड तेजी से बढ़े हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार इन नेटवर्कों में हजारों लोगों को फर्जी नौकरियों के बहाने फंसाया जाता है। बाद में उन्हें ऑनलाइन फ्रॉड, क्रिप्टो स्कैम, रोमांस स्कैम या “डिजिटल अरेस्ट” जैसे धोखाधड़ी वाले काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। कई मामलों में टारगेट पूरा न करने पर मारपीट और यातना तक दी जाती है।
इस तरह के नेटवर्क की खास बात यह है कि यह केवल साइबर अपराध नहीं बल्कि मानव तस्करी और संगठित अपराध का मिला-जुला रूप है। भर्ती भारत जैसे देशों से होती है, संचालन अक्सर दक्षिण-पूर्व एशिया के सीमावर्ती क्षेत्रों से होता है और शिकार दुनिया के अलग-अलग देशों में बैठे लोग बनते हैं। इसीलिए इसे वैश्विक स्तर पर उभरती सबसे खतरनाक आपराधिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जा रहा है।
भारत में भी यह समस्या नई नहीं है। पहले भी कई मामलों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों के युवाओं को म्यांमार या कंबोडिया में फंसे होने की खबरें सामने आई हैं। कई पीड़ितों ने बताया कि उन्हें शुरू में सामान्य नौकरी का वादा किया गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही उनसे धोखाधड़ी वाले कॉल सेंटर में काम करवाया जाने लगा। कुछ मामलों में तो उन्हें प्रतिदिन निश्चित रकम ठगने का लक्ष्य दिया जाता था, जिसे पूरा न करने पर सजा दी जाती थी।
यह घटना एक बड़े सामाजिक और आर्थिक सवाल की ओर भी इशारा करती है। भारत में बेरोजगारी और विदेश में नौकरी पाने की लालसा अक्सर युवाओं को ऐसे जोखिम भरे प्रस्तावों की ओर खींच लेती है। सोशल मीडिया, टेलीग्राम चैनल और फर्जी एजेंट इस कमजोरी का फायदा उठाकर लोगों को जाल में फंसाते हैं।
सरकार और जांच एजेंसियों के लिए चुनौती केवल ऐसे गिरोहों को पकड़ना नहीं है, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को तोड़ना है जो भर्ती से लेकर विदेश में संचालन तक फैला हुआ है। साथ ही यह भी जरूरी है कि युवाओं को विदेश में नौकरी के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी के बारे में जागरूक किया जाए।
क्योंकि असली सवाल सिर्फ एक आरोपी की गिरफ्तारी का नहीं है। असली चिंता यह है कि क्या भारत के हजारों युवा अब भी विदेश में बेहतर भविष्य की तलाश में ऐसे खतरनाक जाल की ओर धकेले जा रहे हैं? और क्या हमारी व्यवस्था उनके सपनों और सुरक्षा के बीच खड़े इन नेटवर्कों को समय रहते रोक पाएगी?


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