इंटरनेशनल/अनबायस्ड स्ट्रिंगर्स। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब केवल हवाई हमलों या कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। समुद्र में भी शक्ति प्रदर्शन तेज हो गया है। ईरान के साथ बढ़ते टकराव के बीच अमेरिका ने अपने सबसे शक्तिशाली सैन्य हथियारों में से एक—एयरक्राफ्ट कैरियर—को क्षेत्र में तैनात कर दिया है। यह कदम केवल सैन्य कार्रवाई की तैयारी भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है कि वाशिंगटन इस संघर्ष को लेकर कितनी गंभीरता से तैयार है।
रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र में अपने दो बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर पहले ही तैनात कर दिए थे और अब तीसरे कैरियर को भेजने की तैयारी भी की जा रही है। इनमें प्रमुख रूप से यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड, यूएसएस अब्राहम लिंकन (सीवीएन-72) और संभावित रूप से यूएसएस जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (सीवीएन-77) शामिल हैं। इन जहाजों की तैनाती से क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
दरअसल एयरक्राफ्ट कैरियर को आधुनिक युद्ध का “चलता-फिरता एयरबेस” कहा जाता है। एक बड़ा कैरियर अपने साथ दर्जनों लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और हजारों सैनिक लेकर चलता है। इससे किसी देश को बिना जमीन पर बेस बनाए समुद्र से ही हवाई हमले करने की क्षमता मिल जाती है। यही कारण है कि जब भी किसी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो अमेरिका अक्सर सबसे पहले अपने कैरियर स्ट्राइक ग्रुप वहां भेजता है।
ईरान के साथ मौजूदा टकराव में भी यही रणनीति दिखाई दे रही है। अमेरिकी नौसेना के कैरियर से उड़ान भरने वाले एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट जैसे लड़ाकू विमान और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जेट ईरान के खिलाफ हवाई अभियानों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये विमान हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के हमले करने में सक्षम हैं और दुश्मन के रडार व संचार प्रणाली को भी बाधित कर सकते हैं।
इन कैरियर की तैनाती का एक बड़ा उद्देश्य केवल हमला करना नहीं बल्कि “डिटरेंस” यानी रोकथाम भी होता है। जब एक साथ कई सुपरकैरीयर किसी क्षेत्र में मौजूद होते हैं तो वे विरोधी देश को संकेत देते हैं कि यदि संघर्ष बढ़ा तो जवाब बेहद ताकतवर होगा। इसी वजह से विश्लेषक इसे युद्ध की तैयारी के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति भी मानते हैं।
मौजूदा स्थिति में खास बात यह है कि एक ही समय में इतने बड़े अमेरिकी कैरियर का एक क्षेत्र में मौजूद होना अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है। आम तौर पर अमेरिका अपने 11 सक्रिय कैरियर को अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात रखता है। लेकिन ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने इस संतुलन को बदल दिया है और पश्चिम एशिया को प्राथमिक सैन्य क्षेत्र बना दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग, खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य, वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि यहां संघर्ष बढ़ता है तो इसका असर ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसी कारण दुनिया के कई देश इस स्थिति पर करीब से नजर रखे हुए हैं।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर और अरब सागर भारत के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख रास्ते हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों का बढ़ना नई सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। भारत के पास भी अपने एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, लेकिन उनकी भूमिका और क्षमता अमेरिकी नौसेना की वैश्विक तैनाती से काफी अलग है।
यही वजह है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल एक सैन्य तैनाती की खबर नहीं है। यह उस बदलती वैश्विक राजनीति की झलक भी है जिसमें समुद्र, ऊर्जा और सैन्य शक्ति एक दूसरे से गहराई से जुड़ते जा रहे हैं।
आखिरकार सवाल यह है कि क्या इन विशाल युद्धपोतों की मौजूदगी केवल शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रहेगी, या फिर यह संकेत है कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष आने वाले समय में और व्यापक रूप ले सकता है?


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